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ऐसे हुई थी पहले शिवलिंग की उत्पत्ति, ज्ञान और तेज का करता है प्रतिनिधित्व

हिंदू धर्म में शिवलिंग की पूजा की जाती है. लिंग को भगवान शिव के रूप में देखा जाता है. महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर शिवलिंग पूजा का विशेष महत्व है. लेकिन क्या आप जानते हैं लिंग की उत्पत्ति कैसे और क्यों हुई नहीं तो जान लीजिए.

‘शिव’ का अर्थ है-‘कल्याणकारी’ और ‘लिंग’ का अर्थ है- ‘सृजन.

मान्यताओं के अनुसार, लिंग एक विशाल लौकिक अंडाशय है, जिसका अर्थ है ब्रह्माण्ड. इसे पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है, जहां ‘पुरुष’ और ‘प्रकृति’ का जन्म हुआ है.

शिवलिंग, महादेव के ज्ञान और तेज का प्रतिनिधित्व करता है. शिवलिंग की जल, दूध, बेलपत्र से पूजा की जाती है. शक्ति के चिह्न के रूप में लिंग की पूजा होती है.

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संस्कृत भाषा के अनुसार, “लिंग” का मतलब है चिह्न या प्रतीक. भगवान शिव को देवआदिदेव भी कहा जाता है, जिसका मतलब है कोई रूप ना होना. भगवान शिव अनंत काल और सर्जन के प्रतीक हैं.

लिंगमहापुराण में सबसे पहले शिवलिंग की स्थापना कहां हुई. एक बार भगवान ब्रह्मा और विष्णु के बीच अपनी-अपनी श्रेष्ठता साबित करने को लेकर विवाद हो गया. दोनों स्वंय को श्रेष्ठ बताने के लिए एक-दूसरे का अपमान करने लगे. लेकिन जब दोनों का विवाद बढ़ गया, तब अग्नि की ज्वालाओं से लिपटा हुआ एक विशाल लिंग दोनों देवों के बीच आकर स्थापित हो गया.

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इसके बाद दोनों देव इस लिंग के रहस्य का पता लगाने में जुट गए. भगवान ब्रह्मा उस लिंग के ऊपर की तरफ बढ़े और भगवान विष्णु नीचे की ओर जाने लगे. हजारों वर्षों तक जब दोनों देव इस लिंग का पता लगा पाने में नाकाम रहे, तो वह अपनी हार कबूलते हुए फिर उसी जगह पर पहुंचे जहां पर उन्होंने उस विशाल लिंग को देखा था. लिंग के पास पहुंचते ही दोनों देव उस लिंग के पास से ओम स्वर की ध्वनि सुनाई देने लगी. इस स्वर को सुनकर दोनों को यह अनुमान हो गया है कि यह कोई शक्ति है. दोनों देव ओम के स्वर की आराधना करने लगे.

ब्रह्मा और विष्णु की आराधना से भगवान शिव बेहद प्रसन्न हुए और उस विशाल लिंग से स्वयं प्रकट हुए. उन्होंने दोनों देवों को सदबुद्धि का वरदान दिया और वहीं उस विशाल शिवलिंग के रुप में स्थापित होकर वहां से अंतर्ध्यान हो गए. लिंगमहापुराण के अनुसार विशाल लिंग भगवान शिव का सबसे पहला शिवलिंग माना जाता है.

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