अध्यात्म

तो इस कारण से गिलहरी के पीठ में ओता है ये चिन्ह, इसका होता है ये अर्थ…

आप लोगो ने गिलहरी तो देखी होगी. क्या आपने कभी सोचा है की गिलहरी की पीठ पर जो निशान होते है. वो किसलिए है और यह निशान उस पर कैसे पड़ा है, तो हम आपको बताते है कि गिलहरी की पीठ पर यह निशान भगवान श्रीराम के द्वारा दिए गए निशान है. जिसकी कथा हम आपको बताते है. 

जब रामजी को 14 वर्ष का वनवास मिला था. तब उस 14 वर्ष के बीच में राम जी और लक्ष्मण जब शिकार पर गए हुए थे और तब सीता माता अपनी कुटिया में अकेली थी. उसी समय रावण एक साधू का रूप लेकर आया और माता सीता का हरण करके ले गया. रावण ने सीता माता को लंका में अशोक वाटिका में कैद करके रखा था. उस समय माता सीता को खोजते हुए राम लक्ष्मण की मुलाकत सुग्रीव से हुई. फिर सुग्रीव ने भी सीता माता को ढूँढने में राम लक्ष्मण की मदद की थी.

इसी समय हनुमान जी समुद्र पार करके लंका में माता का पता लगा कर आये और भगवान राम को सीता माता के बारे में बताया. तब भगवान राम ने लंका पर आक्रमण करने के लिए छोटे से लेकर बड़े जानवरो के सहयोग से समुद्र में पुल बनाने का काम शुरू किया और पुल बनाने के लिए बड़े से लेकर छोटे छोटे पत्थरो की सहायता से पुल का निर्माण कार्य शुरू किया.

उसी समय की बात है, वहां पर एक पेड़ था उस पेड़ पर एक गिलहरी रहती थी. पुल बनाने का काम देखकर गिलहरी भी उस पेड़ से नीचे उतर कर उनकी मदद करने के लिए आ गयी. वह गिलहरी समुद्र के पानी में डुबकी लगाती और अपने रोयेंदार शरीर में बालू और पत्थरों के कणों को चिपका कर ले आती और फिर पुल पर जाकर अपने शरीर को जोर-जोर से हिलाती ताकि जो बालू उसके शरीर में चिपकी है, वह पुल पर गिर जाए और पुल मजबूत हो जाए. जब भगवान राम ने यह सब देखा तो गिलहरी का यह काम देखकर भगवान श्रीराम की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा.

उन्होंने गिलहरी के प्यार समर्पण को देखकर प्यार से उसे अपनी गोद में उठाया और प्यार से सहलाते हुए बोले तुम नन्ही सी जान हो किंतु तुम्हारे सहयोग की भावना और मेरे प्रति तुम्हारा यह समर्पित प्रेम अतुलनीय है. इसलिए संसार में तुम जहां कहीं भी रहोगी लोग तुम्हें देखकर मुझे याद करेंगे. लोगों का ऐसा मानना है कि जब भगवान श्रीराम ने ये बात कहकर उस गिलहरी को सहलाया तो उनकी उंगलियों के निशान धारी के रुप में उसकी पीठ पर बन गए और आज तक बने हुए हैं.

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